बीस किलो गेंहू की दास्तान 🙏🏻 निवेदक🙏🏻 ग्राम प्रभारी एवं प्रधानाचार्य *डॉ. अशोक कुमार प्रजापत*रा.उ.मा.वि. तवाव(जालोर)

*बीस किलो गेंहू की दास्तान*
 *आज की डायरी*
समय :- 7 पीएम
दिनांक :- 22.04.2020
तवाव (जालोर)
 _खाद्य सुरक्षा योजना सर्वे_


            वैश्विक महामारी कोरोना ने आज एक तरफ पूरे विश्व को गंभीर संकट में डाल दिया है वही दूसरी तरफ हमें आत्म चिंतन और आत्मश्चेतना का सुनहला अवसर प्रदत्त किया है। आपाधापी भरे उस दौर को छोड़कर आज हम सुकून से दो पल सोच सकते है, दुनिया के दृश्यों को छोड़कर हम अपने अंदर झांक सकते है , हम अपने जीवन के चारो तरफ़ निगाहे डाल सकते है और हम हमारे इर्द गिर्द विविध विषम परिस्थितियों में जीवन यापन करने को मजबूर इंसानी परिवारों का सूक्ष्म अवलोकन कर भी सकते है। क्योंकि प्रकृति ने भी हमें आत्मवलोकन का मौका दिया है। इसलिए हमें अपने अंदर झांक के अपने आप को परिष्कृत करना इस समय का बहुत बड़ा सदुपयोग होगा । अतएव हमें अपने आप में सकारात्मक बदलाव लाने ही होंगे।
             
         दरअसल बात यह है कि सरकार के आदेशानुसार प्राप्त निर्देशों के तहत खाद्य सुरक्षा अधिनियम के अंतर्गत लाभान्वित परिवारों का निरीक्षण करने का आज मौका मिला , जिसके तहत योजना के अधीन परिवारों का भौतिक सत्यापन कर वस्तु स्थिति को समझा गया। मगर बड़े दुख के साथ यह बात साझा करनी पड़ रही है कि हमारे गांव में कई परिवार ऐसे है जिनके पास विशेषतौर से इस संकट की घड़ी में सब्जी तो छोड़िए,  केवल सुखी रोटी भी दिन के दो समय नसीब नहीं हो पा रही है और वो भुखमरी का दंश झेल रहे है। यह एक दुःखद सच्चाई है।
           किसी शाम गांव में कोई भूखा सो जाए यह बात केवल गांव को नहीं बल्कि सम्पूर्ण मानवता को शर्मसार करने वाली होती है इसलिए हम सबको आगे आना चाहिए और इस बात पर गौर करना चाहिए कि कम से कम कोई भूखा तो न सोए ।
             यहाँ यह तथ्य भी उल्लेखनीय है कि सरकार द्वारा प्रदान किया जा रहा अनाज उन्हीं परिवारों तक पहुचे जो वाकई में इसके हकदार है बाकी परिवार जो अब मुख्य धारा में आ गए है उन्हें स्वेच्छा से इस लाभ को त्याग देना चाहिए इस संकट की घड़ी में यही मानवता का सबसे बड़ा धर्म होगा।

           सक्षम परिवारों द्वारा बड़ा दिल दिखाकर न लेना ही अक्षम परिवारों को देने के बराबर होगा। और हम यह कर सकते है हमारी परंपरा ही ऐसी है, हम त्याग की तपोभूमि के निवासी है हमारा इतिहास महिमामयी त्याग की सैकड़ों कहानियों से भरा पड़ा है। हम उस ऐतिहासिक परम्परा के लोग है जिसमे महादानी कर्ण और भामाशाह जैसे नाम सुनहरे अक्षरों में उकेरे गये है हम  कलाम जैसे राष्ट्रपति जी को जानते है जो एक राष्ट्राध्यक्ष होने के बावजूद भी जिनका कोई बैंक बैलेंस नहीं था, और अपना सर्वस्व राष्ट्र को समर्पित कर दिया था । ऐसी ही अनगिनत हस्तियां है जिन सभी का नाम लेना भी यहाँ सम्भव नहीं है जिन्होंने इस देश को अपने अथक प्रयासों से गढ़ा और मानवता की अप्रतिम मिसालें दी।।।
           इसी फेहरिस्त में अनाज के इस संकट में हम उस महामानव को कैसे भूल सकते है जो हम सभी भारतीयों के स्मृति पटल पर अमर है भारतीय त्याग की प्रतिमूर्ति *राजा रंतिदेव* जिन्होंने अड़तालीस दिन भूखे रहने के बाद जैसे ही भोजन हाथ में लिया वैसे ही उनके द्वार पर भूख से तड़फता हुआ कोई आ गया था।  राजा ने भूख से दुर्बल कंप कंपाते हाथों से उस पूरे भोजन को भी उस आगन्तुक को ससम्मान सुपूर्द कर दिया था। ये हमारा गौरवमयी अतीत है जो हमें यही प्रेरणा देता है कि हम भी यथासम्भव ,यथाशक्ति किसी के काम आए।
   
          अतः मैं आप सभी आम ओ खास से अपील करता हूं कि इंसानियत के नाते गरीबों को सम्बल देने में अपना योगदान दे , वर्तमान परिस्थितियों में यही सच्ची देशभक्ति होगी।
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किसी के काम जो आये, उसे इन्सान कहते हैं।
पराया दर्द अपनाये जो , उसे इन्सान कहते हैं॥
       
            🙏🏻    निवेदक      🙏🏻
         ग्राम प्रभारी एवं प्रधानाचार्य
      *डॉ. अशोक कुमार प्रजापत*
          रा.उ.मा.वि. तवाव(जालोर)

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