रावण को हराने के लिए पहले खुद राम बनना पड़ता है। विजयादशमी यानी अश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दसवीं तिथि जो कि विजय का प्रतीक है। वो विजय जो श्रीराम ने पाई थी रावण पर, वो रावण जो पर्याय है बुराई का, अधर्म का, अहम् का, अहंकार का और पाप का, वो जीत जिसने पाप के साम्राज्य का जड़ से नाश किया।




रावण जो बुराई का, बुराई का, अधर्म का, आज तक जीवित है इसलिए हम उसके प्रतीक को एक पुतले को जलाते हैं न कि उसे, जबकि अगर हमें रावण का सच में नाश करना है तो हमें उसे ही जलाना होगा, उसके प्रतीक को नहीं।

 

वो रावण जो हमारे अंदर है लाल के रूप में, झूठ बोलने की प्रवृत्ति के रूप में, व्यवहार के रूप में, शैतान के रूप में, वासना के रूप में, अलसी के रूप में, उस शक्ति के रूप में जो आते हैं पद और पैसे से, ऐसे ही रूप हैं, जो रावण हमारे अंदर ही रहते हैं, हम सबको जलाना होगा।

 

यह नाश हम कर सकते हैं और हमें भी करना होगा। जिस प्रकार के अंधकार का नाश करने के लिए एक छोटा सा दीपक ही काफी है, उसी प्रकार हमारे समाज में व्याप्त इस रावण का नाश करने के लिए एक सोच ही काफी है। अगर हम अपनी आने वाली पीढ़ी को संस्कारित करें, उन्हें अपमानित करें, स्वयं राम उनके सामने उदाहरण पेश करें तो इतने सारे रामों के बीच क्या रावण की झलक दिखेगी?

 

हम सालभर रावण वध का इंतजार क्यों करते हैं? वो सतयुग था जब एक ही रावण था लेकिन कल आज युग है, आज कई रावण हैं। उस रावण के दस सिर थे लेकिन हर सिर का एक ही चेहरा था, जबकि आज के रावण का सिर एक ही चेहरा है, चेहरे पर कई हैं, मृतकों पर चेहरे हैं जो नकाबों के पीछे के हथियार हैं।

 

इसलिए इनमें से एक दिन काफी नहीं है, क्वेश्चन रोज की बातें हमें अपने में शामिल करना होगा। उस रावण को प्रभु श्रीराम ने तीर से मारा था, आज हम अब्बास राम को संस्कारों से, ज्ञान से और अपनी इच्छा शक्ति से मारेंगे। 



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